March 19, 2019 कहानी खाटू श्याम जी की

कहानी खाटू श्याम जी की

खाटू श्याम जी का असली नाम बर्बरीक है. महाभारत की एक कहानी के अनुसार बर्बरीक का सिर राजस्थान प्रदेश के खाटू नगर में दफना दिया था. इसीलिए बर्बरीक जी का नाम खाटू श्याम बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुआ | खाटू श्याम बाबा जी कलियुग में श्री कृष्ण भगवान के अवतार के रूप में जाने जाते हैं|

बर्बरीक का नाम खाटू श्याम जी कैसे पड़ा, आइये इसकी कहानी जानते हैं|
बर्बरीक घटोत्कच और नागकन्या (मौरवी) के पुत्र हैं|  पांडवों में सर्वाधिक बलशाली भीम उनके दादा जी थे|
बर्बरीक बालपन में एक वीर और तेजस्वी बालक थे. बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण और अपनी माँ मौरवी से युद्धकला सीखकर निपुणता प्राप्त कर ली थी. बर्बरीक ने महादेव की तपस्या की थी, महादेव ने बर्बरीक की तपस्या से प्रशन्न होकर आशीर्वादस्वरुप बर्बरीक को 3 चमत्कारी बाण प्रदान किए , भगवान अग्निदेव ने बर्बरीक को एक दिव्य धनुष दिया था, जिससे वो तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर सकते थे |
जब महाभारत के  युद्ध की सूचना बर्बरीक को मिली तो उन्होंने भी युद्ध में भाग लेने का निर्णय लिया, बर्बरीक ने अपनी माँ का आशीर्वाद लिया बर्बरीक की माता ने सोचा की कौरव सौ भाई है और पांडव केवल पाँच भाई है परिणामस्वरूप पांडव की हार निश्चित है इसलिए  उन्होने बर्बरीक वचन लिया की वह हारे हुए पक्ष का साथ देगा , और माँ को  हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन देकर निकल गये |  इसी वचन के कारण हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा यह बात प्रसिद्ध हो गई|
जब बर्बरीक जा रहे थे तो उन्हें मार्ग में एक ब्राह्मण मिला | यह ब्राह्मण कोई और नहीं, भगवान श्री कृष्ण थे | ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने बर्बरीक से प्रश्न किया कि वो केवल 3 बाण लेकर लड़ने को जा रहा है ? केवल 3 बाण से कोई युद्ध कैसे लड़ सकता है ? बर्बरीक ने मुस्कुराते हुए कहा की उनका केवल एक ही बाण शत्रु की पूरी सेना को समाप्त करने में सक्षम है और इसके बाद भी वह तीर नष्ट न होकर वापस उनके तरकश में आ जायेगा | अतः अगर तीनों तीर के उपयोग से तो सम्पूर्ण जगत का विनाश किया जा सकता है!!!
जब श्री कृष्ण को बर्बरीक की शक्ति का पता चला तो उन्होंने बर्बरीक को चुनौती दी कि अगर वो जिस पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा है उसके सभी पत्तो को आपस में भेदकर दिखाए| तब उनको  बर्बरीक की शक्ति पर विश्वास हो जाएगा | बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार कर ली और  तीर छोड़ने से पहले ध्यान लगाने के लिए आँखे बंद कर दी | तब श्री कृष्ण से बर्बरीक को पता लगे बिना , पीपल की एक पपत्ती को तोडकर अपने पैरो के नीचे छुपा लिया | जब बर्बरीक ने पहला तीर छोड़ा तो सभी पत्तियों और निशान हो गये और उसके बाद बाण ब्राह्मण बने कृष्ण के पैर के चारों तरफ घूमने लगा.
अब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से पूछा कि “तीर भी मेरे पैरो के चारो ओर क्यों घूम रहा है ? ” इस पर बर्बरीक ने जवाब दिया कि “शायद आपके पैरो के नीचे एक पत्ती रह गयी है और ये तीर उस छुपी हुयी पत्ती को निशाना बनाने के लिए पैरो के चारो ओर घूम रहा है ” | बर्बरीक ने श्री कृष्ण से कहा “ब्राह्मण राज आप अपना पैर यहा से हटा लीजिये वरना ये तीर आपके पैर को भेद देगा “| श्री कुष्ण के पैर हटते ही उस छुपी हुयी पत्ती ;पर भी निशान हो गया | तब श्री कृष्ण ने समझ लिया कि बर्बरीक के तीर अचूक है
श्री कृष्ण बर्बरीक के पराक्रम से प्रसन्न हुए. उन्होंने पूंछा कि बर्बरीक किस पक्ष की तरफ से युद्ध करेंगे. बर्बरीक बोले कि उन्होंने लड़ने के लिए कोई पक्ष निर्धारित किया है, वो तो बस अपने वचन अनुसार हारे हुए पक्ष की ओर से लड़ेंगे | श्री कृष्ण ये सुनकर विचारमग्न हो गये क्योकि बर्बरीक के इस वचन के बारे में कौरव जानते थे. कौरवों ने योजना बनाई थी कि युद्ध के पहले दिन वो कम सेना के साथ युद्ध करेंगे. इससे कौरव युद्ध में हराने लगेंगे, जिसके कारण बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ने आ जायेंगे. अगर बर्बरीक कौरवों की तरफ से लड़ेंगे तो उनके चमत्कारी बाण पांडवों का नाश कर देंगे|
कौरवों की योजना विफल करने के लिए ब्राह्मण बने कृष्ण ने बर्बरीक से एक दान देने का वचन माँगा ! बर्बरीक ने दान देने का वचन दे दिया | दान मे श्री कृष्ण ने बर्बरीक का सिर माँगा
इस विचित्र दान की मांग सुनकर बर्बरीक आश्चर्यचकित हो गये और समझ गये कि यह ब्राह्मण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हो सकता | बर्बरीक ने प्रार्थना कि वो दिए गये वचन अनुसार अपने सिर का दान अवश्य करेंगे, परन्तु  पहले ब्राह्मणदेव अपने वास्तविक रूप में प्रकट हों|
तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण अपने असली रूप में प्रकट हुए| बर्बरीक बोले कि हे देव मैं अपना सिर  देने के लिए वचनबध हूँ परन्तु मैं युद्ध अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ श्री कृष्ण बर्बरीक ने बर्बरीक की वचनबद्धता से प्रसन्न होकर उसकी इच्छा पूरी करने का आशीर्वाद दे दिया. बर्बरीक ने अपना सिर काटकर श्री कृष्ण को दे दिया |
श्री कृष्ण ने बर्बरीक के सिर को  युद्धभूमि के पास एक पहाड़ी पर स्थित कर दिया, जहाँ से बर्बरीक युद्ध को देख सकें | इसके पश्चात कृष्ण ने बर्बरीक के धड़ का शास्त्रोक्त विधि से अंतिम संस्कार कर दिया |
युद्ध समाप्त  होने पर जब जीते हुए पांडवों में यह बहस होने लगी कि इस विजय का श्रेय किस योद्धा को जाता है तो श्री कृष्ण ने बर्बरीक के सिर को इस निर्णय लेने को कहा कि किसकी वजह से पांडव युद्ध जीते | तब बर्बरीक के सिर ने सुझाव दिया कि केवल श्री कृष्ण  है जिनकी वजह से महाभारत युद्ध में पांड्वो की जीत हुयी क्योंकि उनकी रणनीति की इस युद्ध में अहम भूमिका थी और इस धर्मं युद्ध में धर्म की जीत हुयी है |
श्री कृष्ण वीर बर्बरीक की महानता से अति प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा – हे वीर बर्बरीक आप महान है. मेरे आशीर्वाद स्वरुप आज से आप मेरे नाम श्याम से प्रसिद्ध होओगे. कलियुग में आप कृष्णअवतार रूप में पूजे जायेंगे और अपने भक्तों के मनोरथ पूर्ण करेंगे
उसके बाद श्री कृष्ण ने बर्बरीक के सिर को   रूपवती नदी में बहा दिया | कई सालो बाद कलयुग की शुरूवात में उनका सिर जमीन में दफन वर्तमान राजस्थान के खाटू गाँव में मिला |  कलयुग की शुरुआत में इस जगह को छुपाये हुए रखा गया | एक दिन उस जगह पर गाय के थन से अचानक उस जगह पर दूध गिरने लगा | इस चमत्कारी घटना को देखते हुए स्थानीय गाँव वालो ने उस जगह को खोदा और वो सिर बाहर निकाला | खाटू के राजा रूप सिंह चौहान को एक सपना आया कि उनको एक मन्दिर बनवाना है जिसमे के सिर को स्थापित करना है | तब खाटू श्याम बाबा मन्दिर का निर्माण शूरू किया गया और फागुन मास की शुक्ल पक्ष के 11 वे दिन उनकी प्रतिमा को स्थापित किया गया |
भगवान श्री कृष्ण का वचन सिद्ध हुआ और आज हम देखते भी हैं कि भगवान श्री खाटू श्याम बाबा जी अपने भक्तों पर निरंतर अपनी कृपा बनाये रखते हैं. बाबा श्याम अपने वचन अनुसार हारे का सहारा बनते हैं. इसीलिए जो सारी दुनिया से हारा सताया गया होता है वो भी अगर सच्चे मन से बाबा श्याम के नामों का सच्चे मन से नाम ले और स्मरण करे तो उसका कल्याण अवश्य ही होता है

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